Thursday, August 13, 2009

कभी शब्दों से कुछ कहो

कभी शब्दों से कुछ कहो ,
सच्चा नहीं झूठा ही सही।
पर कहो तो कभी,
शब्दों से कभी कुछ कहो ।

दिन रात तुम्ही को देख कर गुजारी है,
अब तो ये जिंदगी बस याद तुम्हारी है ।
बाकि दो चार दिन भी किसी तरह गुजर जायेंगे ,
फिर सोचेंगे की क्या खोएंगे और क्या पाएंगे ।

देखो अब नाटक छोड़ो और कभी शब्दों में कुछ कहो,
माना हमसे हुई थी गिला पर जिंदिगी भर की सजा मत दो ।
आओ अब खिलखिला के हसो और मुझसे बातें करो ,
बता दो अपनी सारी कहानी और अब यूँ न डरो।

जाने भी दो अब कुछ देर में ये रात भी कट जायेगी,
क्या तुम्हारी फूलों वाली तस्वीर से कभी आवाज़ आएगी ?

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