Friday, December 5, 2008

हवाओं में ज़हर है

मुंबई पर एक बार फिर से हमला हुआ. हमारी सेहन शक्ति अब जबाब दे रही है. भारत अब सड़कों पर आ गया है एक मुहीम में आतंकवाद के खिलाफ. एक कविता आतंक से लड़ने के लिए:

लो एक बार फिरसे हवाओं में ज़हर है
रात काफ़ी अँधेरी, और अभी दूर सेहर है

हर बार हम चुप चाप इन जुल्मो को सहते रहे
ये सोच के की कभी आएगा नया सबेरा उस पार

पर अंधेरों की आग में हो तुम इस कदर सोये हुए
पुराने सपनो को सजाये और उनमे खोये हुए

इन्ही सपनो का ज़हर दिया है एक बार फिर तुमने
अभी तक तो सहा है बार बार क्यों हमने

पर अबकी बार ये ज़हर कुछ अन्दर तक चुभा है
अब तो जो सहा है वो बोहुत सहा है

तेरे जुल्मो को हम अब और नहीं सहेंगे
अबकी आग अन्दर से है उसे बुझाने नहीं देंगे

तेरे नापाक इरादों का जबाब देंगे हम
जिस ज़बान को तू समझता है उस ज़बान को बोलेंगे हम

नहीं बुझने देंगे अबकी इस जलती हुई आग को
हवा देंगे कि उडे चिंगारियां, नहीं रोकेंगे जलते हुए हाथ को

इस बार चुप चाप नहीं सह सकेंगे हम
हवाओं में ज़हर हैं अब नहीं रोक सकेंगे हम

मत ले इम्तेहान हमारे होसलों का फिरसे
शराफत को न समझ हमारी कमजोरी जिगर से

इस बार मौसम कुछ बदला बदला सा है
हवाओं में ज़हर है उसे पी रहें है हम
ज़बाब देंगे तेरा तेरी ज़बान में चुप न रहेंगे हम
हवाओं में ज़हर है अब नहीं रोक सकेंगे हम।

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